Kabir Das Poems have remained remarkably relevant for centuries because they speak about questions that every human being can understand: Who are we? What is the meaning of life? Where can we find God? Why do people fight over religion? What is true love? And why do we search for happiness outside ourselves? Kabir Das … Read more
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में, जहाँ मनुष्य तनाव, लालच और अहंकार में उलझा हुआ है, कबीर साहेब के दोहे हमें आत्मचिंतन और सादगी का महत्व समझाते हैं। इस लेख में हम कबीर साहेब के 5 ऐसे अनमोल दोहे प्रस्तुत कर रहे हैं, जो सच में जीवन को बदल देने की शक्ति रखते हैं। “कबीर … Read more
SADGURU KABIR SAHEB DOHE: सद्गुरु कबीर साहेब के दोहे गलत धारणाओ को अलग करके वास्तविकता को दर्शाते है। दुर्लभ मनुष्य-जन्म को सार्थक करने के लिए सभी मानव कपटी काल-प्रपंच , कल्पित जड़, देवी – देवों, मिथ्या मान्यताओं एवं माया – मोह से सर्वथा परे हो। सर्व मान्य है कि सद्गुरु कबीर साहेब ने वर्ण -जाती, … Read more
उ. मन का जड़पना तभी मिटेगा जब किसी पुरे गुरु या सन्त का शरणलेकर उनके आदेश का पालन करेगा यानि उनके बताये हुए युक्ति के साथ अन्तर्मुख साधन में लगेगा तब मन चैतन्य हो जायेगा और उसका जड़पना मिट जायेगा।
गुरु शिष्य प्रश्न उत्तर | अनमोल ज्ञान
कबीर साहेब गुरु शिष्य प्रश्न उत्तर
प्रश्न 3. तन में इन्द्रियों का चालक कौन हैं?
उ . तन या शरीर में इन्द्रियों का चालक मन हैं।
प्रश्न 4 . मन को शक्ति कहाँ से मिलती हैं?
उ. मन को शक्ति सुरत से मिलती हैं।
प्रश्न 5 . मन किसका अंश है और सुरत किसका अंश हैं?
उ. मन शब्द ब्रह्म का अंश है तथा सुरत सत्यपुरुष का अंश हैं।
प्रश्न 6 . मन का आहार क्या है और सुरत का आहार क्या हैं?
उ. मन का आहार इन्द्रियों का बिषय भोग है। तथा सुरत का आहार शब्द धुन से मिलता है।
प्रश्न 7 . सुरत और मन का असल मुकाम कहाँ है?
उ. सुरत का असल मुकाम सत्यलोक है और मन का असल मुकाम त्रिकुटी में है।
प्रश्न 8 . मन कहाँ बैठ कर संसार का काम करता है?
उ. मन का बैठक दोनों आँखों के पीछे है और वाह्म इन्द्रियों से संसार का काम करता हैं।
प्रश्न 9 . अभ्यास में मन क्यों नहीं लगता है?
उ. मन जब तक विषय भोग या धन – परिवार के मोह में फंसा रहेगा तब तक अंदर में शब्द धुन सुनाई नहीं देगा।
प्रश्न 10 . मन को संसार के भोग – विषयों से कैसे हटाया जाय?
उ. मन जब तक पुरे गुरु या साधु एवम उनके सत संगियों से गहरा प्रेम से सेवा सत्संग नहीं करेगा तब तक संसार से उपराम नहीं होगा।
प्रश्न 11. गुरु से क्या मांगना है और उनको क्या देना है?
उ. अपने आप को समर्पण उनके चरणों में कर देना है और मालिक को मांगना है।
गुरु शिष्य प्रश्न उत्तर, मालिक जीव पर कब और कैसे राजी होते हैं?
प्रश्न 12 . मालिक जीव पर कब और कैसे राजी होते हैं?
उ. मालिक जीव पर तब राजी होते है, जब जीव अपने – आपको सतगुरु के हवाले कर देता है। जब गुरु राजी हो जाये तो मालिक राजी हो जाते है। कहा गया है ,
प्रश्न 13. गुरु की सेवा किस तरह करनी चाहिए इसका कोई उदाहरण दें?
उ. गुरु का हुक्म मानना, आज्ञाकारी होना, उनके रज्जा में राजी रहना, चाह रहित सेवा करना , साहेब कबीर क्या कहते है।
।। साखी ।।
फल कारन सेवा करे , गुरु से चाहे मान। कहै कबीर सेवक नहीं , चहे चौगुना दाम।।
गुरु सेवा का फल मुक्ति है , अब सेवक गुरु से अपना मान मर्यादा भी चाहता है। भला बताईये जो शिष्य गुरु का एक पैसे का काम करें और चार पैसा मजदूरी चाहता है , तो वह सेवक नहीं मजुरा है।
।। साखी ।।
सेवक सेवा में रहें , आठ पहर दिन रात। कहँ कबीर कुसेवका , लख चौरासी जात।।
भाव – बाहर गुरु का आज्ञाकारी हो यह कि , गुरु कब और क्या कहेंगे उसको करने के लिए तैयार रहें , आठ पहर यानि चार पहर दिन और चार पहर रात , यह आठ पहर है बाहर में गुरु वाक्य यानि देही सेवा करना और अंदर में शब्द स्वरुप यानि शब्द धुन में मन सुरत से अंदर की सेवा करना।
जो सेवक ये अंदर और बाहर दोनों सेवा ईमानदारी से करता है उस सेवक को सतगुरु अपने धाम सत्यलोक ले जाते है, और जो सेवक कहे का कटपीस करता है वह सेवक नहीं है। उसको काल अपने जाल में फंसाये रखता है , और सच्चे सतगुरु की सेवा में गुमराह करा देता है।
गुरु शिष्य प्रश्न उत्तर, कोई – कोई जीव जन्म भर दुःख काट कर मरते हैं क्यों ?
प्रश्न 14 . कोई – कोई जीव जन्म भर दुःख काट कर मरते हैं क्यों ?
उ. आप खुद देख कर नहीं समझ पाते हैं कि जब भी कोई जीव भरी गलती करता है , तो पुलिस पकड़ती है और बेरहमी से मारती है क्यूंकि तुम गलती मत करो इस तरह हम गलती की सजाय पाते हैं हरजाना भी भरते है फिर भी हम दुनिया क जीव गलती करते हैं।
तब पकड़ कर जेल जाते है मार खाते है यहाँ की यही दशा हैं। हमारी और तीन लोक का मालिक हमको कफ ,खासी , दम्मा , कैंसर , या , टी बी , इत्यादि असाध्य रोगी बनाकर संसार में भेज देते हैं। दुःख सहते है अब डॉक्टर , बैध अनगिनत रुपया लेते है।
चिर फाड़ करते हैं दवा इलाज़ करते हैं , फिर भी कितने रोगी मर जाते है , ये सब दुःख सुख कर्म के फल हैं।
प्रश्न 15 . सुरत का स्वरुप क्या है और क्यों दिखाई नहीं देता ?
उ. सुरत चेतन स्वरुप है और यह ऐसा लतीफ है यानि सूक्ष्म है कि वह स्थूल दृष्टि से दिखाई नहीं देगी, जब संत सतगुरु के द्वारा साधन की युक्ति प्राप्त कर अंतर अभ्यास किया जाता है, और ऊपरी मंडल में चढ़ाई होता है तब रहस्य मालूम होगा या दिखाई देता है।
विशेष समझने योग्य बात यह है कि यह जड़ शरीर चलता है, बोलता है, खाता पीता है, लेकिन यह चेतन, शरीर से जब निकल जाता है तो इसे कोई नहीं देखता।
गुरु शिष्य प्रश्न उत्तर , मन का स्वरुप क्या है
प्रश्न 16 . मन का स्वरुप क्या है गलत मार्ग पर क्यों चलता है ?
उ. मन भी जाग्रत स्वरुप लतीफ़ है और यह शब्द ब्रह्म का अंश है , इसे कर्ता काल निरंजन ने पैदा किया है और शरीर या संसार के घाट – घाट पर चौकीदार बनाया है ताकि कोई जीव काल के हद से बाहर न जाय।
प्रश्न 17 . यह विषय सब बहुत उलझन पूर्ण है इसे कुछ और आसान से समझाइये ?
उ. कर्ता की कुदरती कारोबार को आसानी से हमलोग समझ नहीं पाएंगे। जब तक हमलोग आंतरिक सूक्ष्म मंडल में प्रवेश नहीं करेंगे , जब आप सुरत शब्द योग का साधन करके जायेंगे , और अंदर की आँखें खुलेगी , तब समझ में आएगा कि यह कैसा लीला कर्त्ता मालिक ने बनाया है।
आप देखे और विचार करे एक वट बृक्ष का बीज कितना बारीक़ है और उसमे कैसा विशाल बृक्ष छिपा हुआ है। वह आसानी से देखा या समझा नहीं जायेगा। जब वह बीज धरती में पड़ेगा तब जमेगा और पलाइस पाकर धीरे – धीरे बड़ा होगा।
तब पता लगेगा कि किस तरह बीज में बृक्ष छिपा हुआ था। इसी तरह जब हमलोग गुरु मार्ग पर चल कर अन्दर प्रवेश करेंगे। तब आत्म स्वरुप तथा परमात्म स्वरुप का पहिचान होगा। इसका मतलब यह की ग्रन्थ – पोथियों में पढ़कर भी हमलोग मालिक या परमात्मा के विषय में कुछ समझ या जान सकते है।
लेकिन बिना देखे विश्वास उतना पक्का नहीं होगा। जैसे हम जानते है की मीठा – मीठ है फिर भी बिना खाये मुँह मीठ नहीं होगा। इसी तरह बिना सतगुरु के अन्दर जाने का मार्ग भेद जानकारी नहीं होगा , और जानकारी के बिना साधन नहीं होगा और साधन के बिना अन्दर नहीं जा पाएंगे। वहाँ पहुंचे बिना ये सब चीज देख नहीं पाएंगे।
इस संसार में बड़ा क्या चीज है ? गुरु शिष्य प्रश्न उत्तर ?
प्रश्न 18 . इस संसार में बड़ा क्या चीज है ?
उ. इस संसार में कर्म और विचार बड़ा है। मनुष्य कर्म से बड़ा या छोटा कहलाता है। कर्म से देवता है , कर्म से दानाव है , कर्म से साधु है , कर्म से चोर , कर्म से पंडित , और कर्म से ही मुर्ख कहलाता है। कर्म स्वर्ग और नर्क में ले जाता है।
प्रश्न 19 . चौरासी लाख योनि में सबसे बड़ा कौन है ?
उ. चौरासी लाख योनि है , जिसमे सबसे बड़ा मनुष्य है। लेकिन यह है कि मनुष्य अपने कर्म पर विचार करे , और विचार के साथ कर्म करें , क्यों कि कर्म से ही मानव होता है। एक ही माता के गर्भ से मानव – दानव तथा देव की उत्पति होती है।
प्रश्न 20 . इन तीनो की व्याख्या अलग – अलग कीजिये ?
उ. मनुष्य – सभी जीवों जानवरो पर दया भाव से व्योहार करता है। आप दुःख सह लेता है , पर किसी को दुःख नहीं देता है तथा अन्न – फल, साग – सब्जी, दूध – दही , गुण – चीनी से बना हुआ , मिष्ठान का आहार करता है।
राक्षस – दानव माँस खाता है , मदिरा पिता है वह निर्दयी होता है , जीव हिंसा करता है , और दानव या राक्षस के अन्दर में भय या दर बना रहता है।
देव – साधु या संत देव कहलाते है। इनके अन्दर ईश्वरी शक्ति होती है तथा यों कहो की ये लोग अपने मालिक में समाये रहते है , और ऐसे देव या साधु संत से संपर्क या उनसे प्रेम करैत है तो ऐसे महापुरुषों की संगती से बहुत से जीवों को सदगति प्राप्त हो जाती है , यानि उनके आदेशानुसार साधन भजन करके निजधाम , यानि सत्यलोक चले जाते है।
गुरु शिष्य प्रश्न उत्तर ; कर्म कौन बनाया और क्यों बनाया ?
प्रश्न 21 . कर्म कौन बनाया और क्यों बनाया ?
उ. कर्म का जाल तीन लोक के मालिक कर्ता काल निरंजन ने बनाया , और इसी को संत सतगुरु कर्म का जाल या काल का जाल कहा है , इसे पाप – पुण्य शुभ – अशुभ कहाँ गया है। जिसके चलते स्वर्ग-नर्क या दुःख -सुख हम सभी जीव भोगते है। पुण्य कर्म करके स्वर्ग बैकुंठ जाते है या संसार में सुख – संपन्न राजा – महाराजा सेठ साहूकार बन के आ जाते है।
हमारे हाथ में हुकूमत का बागडोर मिल जाता है , हजारो – लाखो के ऊपर हुकुम चलाते है , तथा नीच या पाप करम करके यमपुरी में जाते है , यमदुतो के हाथ से मार खाते है , नरक में जाते है , फिर चौरासी में जाते है , तब हमारी क्या दसा होती है ,सूअर का तन मिलता है , विष्टा खाते है , कुत्ता सियार होते है , हड्डी चाटते है मांस खाते है , यानि जिस योनि में जाते है वैसा आहार व्यावहार मिलता है।
इस प्रकार कर्म का सिलसिला अनादिकाल से हमारे साथ लगा है। जब तक पुरे संत सद्गुरु की शरण में न जाए तब-तक जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा नहीं पा सकते है।
प्रश्न 22 . कर्म का बंधन या आवागमन की डोरी यानि जन्म-मरण कैसे और कब मिटेगा ?
उ. पुरे सन्त गुरु के शरण में जब जीव जायेगा तथा सुरत शब्द का साधन करके अपने देश यानी धुर मुकाम सत्यलोक , पहुंचने पर जन्म-मरण की डोरी टूट जाएगी या सिमट जाएगी। तब जीव अपने गोत्र में समां जाएगा यानि शब्द रूपी मालिक में सुरत रूपी आत्मा समां यानी प्रवेश कर जाएगी।
प्रश्न 23 . सतगुरु का महत्व क्या है तथा सतगुरु कौन है और सतगुरु भक्ति क्या चीज है ?
उ. गुरु अनन्त है लेकिन महत्व सतगुरु की है इसलिए की जितने गुरु संसार में है सो ब्रह्मपद से लेकर माया जाल में फँसे है और जो उनके शरण में जाते है उनको अपने-अपने हद में रखते है क्यूंकि इससे आगे की जानकारी खुद उन्ही को नहीं है तो और जीवो को कैसे ले जा सकते है।
सतगुरु इन सब मंडलो से परे का ज्ञान बतलाते है , तथा इनका ज्ञान कर्मकांड-मुद्रासाधन ,योग क्रिया (चक्रबेधन ) एवम प्राणायाम से रहित सुरत शब्द योग का साधन करते कराते है तथा जीवो को पिण्ड ब्रह्माण्ड से परे सच्चखण्ड (सत्यलोक ) पहुंचाते है , जहाँ से सुरत की सर्व प्रथम उतार हुयी थी।
प्रश्न 24 . सूरत और प्राण मिले हुए है या जुदा-जुदा,और प्राणो की कितने किस्मे है ?
उ. सूरत और प्राण अलग-अलग है। सूरत तीसरे तील में बैठकर आकाश को चेतना किया है। आकाश में बैठकर दस प्राणो ने चेतन किया है। ये प्राण दो प्रकार के है। पाँच प्राण ऊपर ले ये है, कुर्म , कृंकल , शेष , देवदत्ता , और धननंजय , तथा पाँच प्राण निचले ये , नेत्र से निचे है।
अपान , सामान , व्यान , उधान , तथा प्राण , ये पिन्डी प्राण है। योगियों ने योग समाधी में उपरले प्राण के सहारे शरीर को रखते है , ताकि यह शरीर ख़राब न हो जाय।
गुरु शिष्य प्रश्न उत्तर ; बज्र किवाड़ अंदर में कितने और कहाँ-कहाँ है ?
प्रश्न 25. मुकामी शून्य कौन-कौन है , और कितने है ?
उ . मुकामी शून्य निम्न ये है , पहला सहस्त्रदल कवल ( जिसको झाँझरीदीप , नभ और पिंडी ) शून्य कहा गया है। दूसरा शून्य त्रिकुटी जिसको गगन या गुरूपद भी कहते है।
तीसरा शून्य दसवाद्वार या मानसरोवर कहा गया है। चौथा महासुन्न , पांचवा भावरगुफा , छठा सतलोक , सातवां अलख लोक , आठवां अगमलोक , नवां अनामी धाम कहकर सतगुरु कबीर साहेब तथा अनेक संतो ने व्यान किया है।
प्रश्न 26 . सूरत स्थूल शरीर और जड़ इन्द्रियों को क्यों चेतन करके रखती है , तथा चेतन शक्ति इससे किस प्रकार आती है ?
उ . सूरत इस जड़ शरीर या इन्द्रियों को अपने सुख प्राप्ती के लिए चेतन कर रखा है। और सूरत की धारें चारों अंतःकरण तथा दसो इन्द्रियों में पड़ती है। और सूरत का प्रतिबिम्ब ( तस्वीर ) तीन चक्रो में पडता है।
पहला कंठचक्र में , दूसरा हृदयचक्र में , नाभिचक्र और उसके निचे स्वाधिस्ठान , तथा मूलाद्वार में प्रतिबिम्ब का बिम्ब ( प्रकाश ) आता है। जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब किसी पात्र के पानी में और उसकी प्रकाश दिवार पर होती है।
प्रश्न 27. बज्र किवाड़ अंदर में कितने और कहाँ-कहाँ है ?
उ . बज्र किवाड़ तीन है। पहला तीसरे तील ( पिन्ड – ब्रह्माण्ड ) में है। दूसरा झँझरीदीप के ऊपरी भाग सहस्रदल कवँल के द्वार पर है। तीसरा बंकनाल और त्रिकुटी के मध्य में है। पहला किवाड़ ( पर्दा ) भूल-भ्रम का है , दुसरा मन-माया का है ,और तीसरा काल का है।
प्रश्न 28 . क्षर अक्षर , तथा निःअक्षर से संत-महात्माओ को क्या मुराद ( मतलब ) है , और यह कहाँ-कहाँ लगाए जाते है ?
उ . सद्गुरु कबीर साहेब के कथानुसार निःक्षर भवरगुफा , अक्षर दसवांद्वार , तथा क्षर त्रिकुटी को कहा गया है। दूसरा सच्चे साधुजन , निः अक्षर महासुन्न को , अक्षर दसवाँद्वार को , और क्षर त्रिकुटी को कहते है।
साखी ; क्षर , अक्षर , निः अक्षर पारा , ताके आगे नाम भंडारा।।
अब योगियों या जोगेश्वरों के अनुसार , निः अक्षर सुन्न , अक्षर त्रिकुटी , क्षर सहस्त्रदल कँवल है।
प्रश्न 29 . जोगेश्वर तथा योगी लोग धूर – धाम क्यों नहीं पहुँचते है ?
उ. योगी जोगेश्वर सच्चे कमाई वाले ज्ञानी, बेदांती जिस – जिस मुकाम पर पहुंचे उसी मुकाम को धुर – धाम अनामी मान कर बैठ गए। इन्होने सतगुरु के भेद मुकाम को नहीं जान पाए। जिन्होंने संत सतगुरु की शरण लिया वे ही धुर – मुकाम को पहुंचे या पहुंचते है।
प्रश्न 30 . अभ्यास कितने तरह का है , और हर एक शख्श को उपदेश करने में संतो ने क्यों मन किया है ?
उ. ज्ञान मार्ग जो बेदान्तियो का है। योग मार्ग मार्ग योगियों का, वैराग मार्ग जोगेश्वर ज्ञानियों का , तथा सूरत शब्द योग मार्ग परमसंतों का है। यह चार मार्ग अभ्यास के लिए प्रसिद्ध है। जब तक साधन द्वारा इन सव मार्गो की जानकारी हासिल न हो जाय , तथा आप स्वयं नहीं करते हो , केवल बाचक ज्ञानी है , तब तक उपदेश देने का अधिकारी नहीं है। यदि अपने मनमत उपदेश करेंगे तो उस उपदेश करने वाले और उपदेश लेने वाले दोनों को हानि होगी और कुछ लाभ भी नहीं होगा यदि हाँ तो गुरु के आदेशानुसार उपदेश कर सकते है। इसमें किसी की भी हानि नहीं होगी। क्योंकि शब्द रूपी इंजीन साहेब कबीर है , और पीछे गार्ड धर्मदास है तथा बीच में डब्बा सब उपदेशक ( गुरु ) है। यदि गुरु से प्रेम रूपी हूक ( लगाव ) रहेगा तो सबको खींचकर सतगुरु कबीर साहेब पार कर देंगे।
साखी :
पीछे गार्ड धर्मदास है , डब्बा सब कड़िहार।। आगे इंजीन कबीर है , खींच लगावे पार।।
प्रश्न 31 . कल्प वो मन्वन्तर और चौकड़ी किसको कहते है ?
उ . सतयुग , त्रेता , द्वापर और कलियुग मिलकर एक चौकड़ी होता है। बहत्तर चौकड़ी का एक मन्वन्तर होता है चौदह मन्वन्तर का एक कल्प होता है , और एक कल्प के बाद प्रलय हो जाता है।।
प्रश्न 32 . प्रलय कितने प्रकार का होता हैं , तथा उनमे क्या फर्क है ?
उ . प्रलय चार प्रकार का होता है पहला नित्य प्रलय यानि जीवो का नित्य मरना , दूसरा जल प्रलय , यानि पृथ्वी पर जल ही जल हो जाता है। और जल के जिव के अलावा सबका नाश हो जाता है। तीसरा बैराट प्रलय , त्रिकुटी तक मिट जाता है। चौथा , महाप्रलय भावरगुफा के निचे तक सब नाश हो जाता है। जल प्रलय ब्रहमा का एक दिन रात बीत जाने पर होती है बैराट प्रलय ब्रहमा के सौ वर्ष समापत होने पर होती है। चौदह वैराट प्रलय हो जाने के बाद महा प्रलय होता है।
प्रश्न . स्त्री और पुरुष का भेद कहाँ तक रहता है ?
उ . पुरुष और स्त्री का भेद दसवेदवार तक रहता है , इसके आगे कोई भेद नहीं है। मानसरोवर में स्नान कर लेने के बाद दोनों का रूप एक हो जाता है।
प्रश्न . तन में इन्द्रियों का चालक कौन हैं?
उ . तन या शरीर में इन्द्रियों का चालक मन हैं।
प्रश्न . मन को शक्ति कहाँ से मिलती हैं?
उ. मन को शक्ति सुरत से मिलती हैं।
प्रश्न . मन किसका अंश है और सुरत किसका अंश हैं?
उ. मन शब्द ब्रह्म का अंश है तथा सुरत सत्यपुरुष का अंश हैं।
प्रश्न . मन का आहार क्या है और सुरत का आहार क्या हैं?
उ. मन का आहार इन्द्रियों का बिषय भोग है। तथा सुरत का आहार शब्द धुन से मिलता है।
प्रश्न . स्त्री और पुरुष का भेद कहाँ तक रहता है ?
उ . पुरुष और स्त्री का भेद दसवेदवार तक रहता है , इसके आगे कोई भेद नहीं है। मानसरोवर में स्नान कर लेने के बाद दोनों का रूप एक हो जाता है।
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